NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 Ram-Lakshaman-Parashuram Sanvad राम-लक्षमन-परशुराम संवाद
तुलसीदास
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!Table of Contents

प्रसंग
सीता स्वयंवर के समय जब श्री राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया, तब धनुष टूटने की भयंकर ध्वनि सुनकर मुनि परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर राजा जनक की सभा में उपस्थित होते हैं। इन पंक्तियों में उनके आगमन पर सभा में छाए भय और उसके बाद के घटनाक्रम का वर्णन है।
व्याख्या
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
भृगुवंशी परशुराम जी के अत्यंत भयानक वेश को देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा भय से व्याकुल होकर खड़े हो गए।
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
अपनी जान बचाने और मुनि के क्रोध से बचने के लिए सभी राजा अपने पिता के नाम के साथ अपना नाम ले-लेकर उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगे।
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
परशुराम जी स्वभाववश जिसे भी हितु (मित्र) समझकर देखते थे, वह व्यक्ति डर के मारे ऐसा समझता था मानो उसकी आयु अब समाप्त हो गई है (यानी उसकी मृत्यु निकट आ गई है)।
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
इसके बाद राजा जनक ने आकर मुनि के चरणों में सिर झुकाया और फिर सीता जी को बुलाकर उनसे प्रणाम करवाया।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥
परशुराम जी ने सीता जी को आशीर्वाद दिया, जिससे उनकी सखियाँ प्रसन्न हो गईं। फिर वे सयानी सखियाँ सीता जी को अपनी सखियों के समूह में वापस ले गईं।
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
तभी मुनि विश्वामित्र ने आकर परशुराम जी से भेंट की और श्री राम तथा लक्ष्मण, दोनों भाइयों को उनके चरण-कमलों में गिरा दिया (प्रणाम करवाया)।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
विश्वामित्र जी ने परिचय दिया कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं। इन दोनों भाइयों की सुंदर जोड़ी को देखकर परशुराम जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
परशुराम जी के नेत्र श्री राम के सौंदर्य को देखकर ठिठक गए। श्री राम का रूप इतना अपार और सुंदर था कि वह कामदेव के गर्व को भी चूर करने वाला था।
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
फिर (धनुष के टुकड़ों को) देखकर उन्होंने राजा जनक (विदेह) से पूछा—”कहो, यह कैसी भारी भीड़ है?” वे सब कुछ जानते हुए भी अनभिज्ञ की तरह पूछ रहे थे और उनके शरीर में क्रोध व्याप्त हो रहा था।
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
राजा जनक ने मुनि परशुराम को वह सारा समाचार (सीता स्वयंवर का वृत्तांत) सुनाया, जिसके कारण पृथ्वी के सभी राजा वहाँ एकत्रित हुए थे।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
जनक जी की बातें सुनकर परशुराम जी ने दूसरी ओर देखा, जहाँ पृथ्वी पर शिव धनुष के टुकड़े (चापखंड) पड़े हुए थे।
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुषु कै तोरा॥
धनुष के टुकड़ों को देखकर परशुराम जी अत्यंत क्रोधित हो गए और कठोर वचन बोले— “हे मूर्ख जनक! बता, यह धनुष किसने तोड़ा है?”
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
उन्होंने धमकाते हुए कहा कि उसे (धनुष तोड़ने वाले को) शीघ्र दिखा, नहीं तो आज मैं तेरे पूरे राज्य तक की पृथ्वी को उलट दूँगा।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
परशुराम जी के इस विकराल क्रोध से राजा जनक इतने डर गए कि वे कोई उत्तर नहीं दे पाए। दूसरी ओर, सभा में मौजूद दुष्ट राजा मन ही मन खुश हो रहे थे (कि अब राम-लक्ष्मण को दंड मिलेगा)।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष डर के कारण भारी चिंता में डूब गए और सबके हृदय में भय व्याप्त हो गया।
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
सीता जी की माता (सुनयना) मन ही मन पछताने लगीं और सोचने लगीं कि विधाता ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी है।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
परशुराम जी के क्रोधी स्वभाव के बारे में सुनकर सीता जी इतनी भयभीत हो गईं कि उनके लिए आधा पल भी एक कल्प (युग) के समान बीतने लगा।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हर्षु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
सभा के सभी लोगों को डरा हुआ और सीता जी (जानकी) को भयभीत देखकर, श्री राम (रघुवीर) ने अपने हृदय में बिना किसी हर्ष या शोक के शांत भाव से बोलना शुरू किया।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
राम जी ने कहा— “हे नाथ! शिव जी के इस धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा।”
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
“मेरे लिए क्या आज्ञा है, आप मुझसे क्यों नहीं कहते?” यह सुनकर क्रोधी मुनि (परशुराम) और अधिक चिढ़कर बोले:
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
“सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। शत्रुता का काम करने वाले से तो लड़ाई ही करनी चाहिए।”
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहू सम सो रिपु मोरा॥
“हे राम! सुनो, जिसने भी शिव जी का यह धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा परम शत्रु है।”
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
“वह इस राज-समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।”
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
मुनि के क्रोध भरे वचन सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराने लगे और परशुराम जी का अपमान (तिरस्कार) करते हुए बोले:
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
“हे स्वामी! हमने बचपन में ऐसी बहुत सी छोटी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब तो आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया।”
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगु कुलकेतू॥
“इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है?” यह सुनकर भृगुवंश की ध्वजा स्वरूप परशुराम जी क्रोधित होकर कहने लगे:
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥ “
अरे ओ राजपुत्र! तू काल (मृत्यु) के वश में होने के कारण संभाल कर नहीं बोल रहा है। समस्त संसार में विख्यात भगवान शिव का यह धनुष क्या तुझे छोटी धनुही के समान लगता है?”
NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 Ram-Lakshaman-Parashuram Sanvad राम-लक्षमन-परशुराम संवाद
प्रश्न-उत्तर
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर दीजिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं:
प्रश्न 1:
“पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मन:स्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
(ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार
(घ) प्रेम और सहिष्णुता
सटीक उत्तर:
(ग) भय और शिष्टाचार
तर्क: परशुराम जी के भयंकर वेश और उनके क्रोध को देखकर सभा में उपस्थित राजा “भय से व्याकुल” (भय बिकल) हो गए थे। अपनी जान बचाने के लिए वे डर के मारे (भय) शिष्टाचार का पालन करते हुए अपना और अपने पिता का नाम लेकर उन्हें दंडवत प्रणाम कर रहे थे।
प्रश्न 2:
“जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
सटीक उत्तर:
(ख) शिष्टता
तर्क: राजा जनक एक मर्यादा पुरुषोत्तम राजा थे। परशुराम जैसे महान मुनि के आगमन पर स्वयं आगे बढ़कर सिर झुकाना और अपनी पुत्री सीता से भी प्रणाम करवाना उनके उच्च संस्कारों और “शिष्ट व्यवहार” को दर्शाता है।
प्रश्न 3:
“अति रिस बोले बचन कठोरा” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव-धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
सटीक उत्तर:
(ग) शिव-धनुष का खंडित होना
तर्क: परशुराम जी भगवान शिव के परम भक्त थे। जैसे ही उन्होंने सभा में “शिव-धनुष के टुकड़े” (चापखंड) जमीन पर पड़े देखे, उनका क्रोध भड़क उठा। इसी कारण उन्होंने जनक से कठोर शब्दों में पूछा कि यह धनुष किसने तोड़ा है।
प्रश्न 4:
राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
सटीक उत्तर:
(ख) विनम्रता और मर्यादा
तर्क: जब पूरी सभा परशुराम के क्रोध से कांप रही थी, तब श्री राम ने अत्यंत शांत और “विनम्र स्वर” में स्वयं को उनका ‘दास’ बताया। यह उनके धैर्य, शालीनता और अपनी “मर्यादा” में रहने के गुण को प्रकट करता है।
प्रश्न 5:
“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
सटीक उत्तर:
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
तर्क: लक्ष्मण जी स्वभाव से क्रोधी और निडर थे। जब उन्होंने देखा कि परशुराम जी अपनी वीरता का बखान कर रहे हैं और श्री राम को धमका रहे हैं, तो उन्होंने मुनि के अहंकार को तोड़ने के लिए उपहास का सहारा लिया। वे अपने व्यंग्यपूर्ण वचनों से यह जताना चाहते थे कि वे परशुराम के फरसे से डरने वाले नहीं हैं और उन्हें युद्ध के लिए ललकार रहे थे।
NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 Ram-Lakshaman-Parashuram Sanvad राम-लक्षमन-परशुराम संवाद
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1:
“अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
भाव: इस पंक्ति का भाव है कि अत्यधिक डर और व्याकुलता के कारण समय का एक बहुत छोटा हिस्सा (आधा पल) भी एक अत्यंत लंबे काल (युगों) के समान प्रतीत होने लगता है।
संदर्भ: यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही गई है।
कारण: जब सीता जी ने परशुराम जी के अत्यंत क्रोधी स्वभाव के बारे में सुना और उन्हें क्रोध में देखा, तो वे इतनी भयभीत हो गईं कि उनके लिए प्रतीक्षा का आधा क्षण भी कल्प के समान भारी और लंबा हो गया।
प्रश्न 2:
“सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
प्रभाव: परशुराम जी की इस भयंकर चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।
तर्क: चेतावनी सुनते ही सभा में उपस्थित सभी राजा भय से व्याकुल हो गए। वे अपनी जान बचाने के लिए मुनि के चरणों में गिरकर, अपने पिता का नाम ले-लेकर दंडवत प्रणाम करने लगे। राजा जनक इतने डर गए कि वे कोई उत्तर तक नहीं दे सके। इससे स्पष्ट होता है कि पूरी सभा में दहशत का माहौल व्याप्त हो गया था।
प्रश्न 3:
तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
उचित मार्ग: परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय‘ का मार्ग अधिक उचित है।
तर्क: क्रोध को क्रोध से नहीं, बल्कि शांत स्वभाव और विनम्रता से ही जीता जा सकता है। राम जी ने विनम्रतापूर्वक स्वयं को ‘दास’ कहकर मुनि के क्रोध को कम करने का प्रयास किया। इसके विपरीत, लक्ष्मण जी के तर्क और व्यंग्य ने परशुराम के क्रोध की अग्नि में घी का काम किया, जिससे विवाद और बढ़ गया। अतः विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और विनम्रता ही सबसे बड़ा शस्त्र होती है।
प्रश्न 4:
‘हृदयँ न हर्षु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर:
व्यक्तित्व के गुण: यह पंक्ति राम जी के स्थितप्रज्ञ होने, धैर्य, शालीनता और अपार भावनात्मक नियंत्रण जैसे गुणों को दर्शाती है।
भावनात्मक संतुलन: जहाँ परशुराम जी क्रोध में अपना विवेक खो रहे थे, लक्ष्मण जी उत्तेजना में तर्क कर रहे थे और जनक व अन्य राजा डर से व्याकुल थे, वहीं राम जी बिल्कुल शांत थे। उनका यह संतुलन उन्हें एक मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित करता है, जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा और मानसिक शांति नहीं खोते।
NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 Ram-Lakshaman-Parashuram Sanvad राम-लक्षमन-परशुराम संवाद

